Wednesday, May 28, 2008

बसा है मेरे मन मंदीर में


बसा है मेरे मन मंदीर में,
बस, मेरे मोहन का लौडा.
हर गुज़रा लमहा मोहन बीन,
जैसे सीने पर एक हथौडा.


याद मुझे आता है वो din,
जब हमने देखी थी "आतीश",
बीच हॉल में बैठ के हमने,
कैसे की व्हो, प्यारी साजिश.

फिल्म शुरू होते ही एक दम,
हाथ तेरा घुस गया शर्ट में,
सहलाये माममे तुमने और,
आग लग गयी मेरे तन-मॅन में.

फीर तुमने 'जीप' खोली अपनी,
मैंने हाथ बढाया था,
मेरी बेचैनी पे मुस्काकर,
मम्मा तुमने सहलाया था.

मेरे हाथ पे, थूक रगड़ के,
तुमने लौडा पकडाया फीर,
पौना घंटा रगड़ा लंड और,
फीर रक्छा लौड़े पे मेरा सीर.

चूसा तुमको, कई पलों तक,
फीर तुमने झटका खाया,
मेहनत मेरी रंग लायी और,
मुँह मी "चरणामृत आया".

डाली तुमने ऊँगली मुझमे,
और फीर चूत सहलाई थी,
कुच्छ आँखे, बस हमपे ही थी,
देख के मैं घबराई ठी.

बडे प्यार सी उस गंजे को,
कैसे तुमने टोका था,
"उल्लू Picture, है पर्दे पर",
ये कह करके रोका था.

और सबर, कर पान अब्तो,
हो गया था बिल्कुल नामुमकिन,
कैसे घुसे थे, हम टॉयलेट में,
कैसे दौड़ फीर हर पल-छीन.

नंगा करके तुमने मुझको,
टांग मेरी जो उठाई फीर,
छाती-काटी, फुड्डी मेरी,
दील ने ली अंगडाई फीर.

आखीर फीर वो लमहा आया,
जब चूत मी तुमने डाला लंड,
मौसम था जनवरी का लेकीन,
किसको परवाह, कैसी ठुंड?

कंधे पे थी, टांग मेरी इक,
लंड तुम्हारा अन्दर था,
कैसे मोहन, उठा-उठा के,
तुमने मुझको चोदा था.

नीकल रही थी, चीखें मेरी,
नीकल गया था दुनिया का डर,
ऐसी थी बेरहम चुदायई,
भूल गयी थी बाबुल का घर.

ठीक वक़्त पे, पीछे हटकर,
खींच लिया अपना " लींग,
मुँह मी लौड़ा डाला तुमने,
धन्य हुई पाके "रियल थीग".

कितने प्यारे हो तुम मोहन,
मेरी खुशिया हैं तुमको प्यारी,
तृप्त हो गए थे तुम फीर भी,
चूसी फीर सी मेरी फुड्डी न्यारी.

निकले थे जब हम-तुम बाहर,
कैसा घज़ब नज़ारा था,
सिह्पके ठे दरवाज़े सी चौदह,
चौदह लंडो का नज़ारा था.

हंसी थी कितना बाद में मैं जब,
किस्सा तुमने समझाया मुझको,
मूठ मारना क्या होता है,
जब तुमने बतलाया मुझको.

एक बरस सी हूँ मैं तनहा,
चूत मेरी प्यासी है मोहन,
प्लेस आ जाओ, अमरीका से अब,
सिर्फ तुम्हारा, है ये तन-मॅन

--
........raj.........

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